السبت، 9 مارس 2024

ايا فاتنة...

 ايا فاتنة...

الوصل...
مالي لااراكي..
اخفيت...
عني حاجباكي...
والعيون المحكلة...
بالكحلي تزين الرموش...
غاب طيفك...
وعبيرازهارك ...
اليه قادم...
مااصابك...
تجافيني...
دون عتاب...
نادتيكي ..
في وهج الليل...
لاسامع سمعني..
ولاقمر ناداني...
اياعروس البحور...
كيف اعماقه...
الهواء يطالعني..
والقلب اليك يعذبني....
والعقل يرهقني...
ايحق لكي..
ان تغتاليني..
وانا الحب...
والعشق..
يتاكل في شرايني..
يكفيني عتاب...
وهجر وفراق...
خذي ماتشائين...
ياجنة خلدي..
فاني فقير...
ابحث عن حنانك...
وطيفك ان اتاني..
اشفاني من علتي....
لاتوضعي..
بيني وبينكم...
جسر من الاهات..
ونتري لقلب...
عشق نورقلبك..
من اول لقاء...
لكني لواعرف..
اني عشق..
قلب قاسي..
حجر لما...
طاوعت..
نفسي ...
لعشقه..
وغرست..
سبعون..
سدلاناله..
ودفنته..
حي قبل مماته...
فاويل...
يافاتنتي..
من غز..
مناجيكي..
قد نسيتي...
ليالينا...
وشربتيني..
كاس المر..
من العذابي..
اياحاظنت..
فؤادي سبته..
اليك امانة..
وياكي تعبثين به...
فارماح الموت..
قد تطال..
فاعينيني...
محمرة..
الجفون..
من شقائي...
ولاترمين...
بفؤادي..
قدنلنا..
منك..
كلام..
ونظرات..
تجرح..
مقلتي..
رجانات..
قلبي...
تشتكي..
الى بارج الكون..
انا عبد له..
اين انا من سامقته..
رحلنا ع سفينة الصحراء...
ننادي في فلك...
ينتابه الكلام...
ومن نشاء..
قطعنا..
اشواط..
اليكم ..
لنراء..
ماتخفيه..
البراري..
العشق فيه..
عبادة..
للواحد القهارو..
رحماك ياروح...
عذابك شقاء..
من يحمل..
الموانات..
في الهواء..
لايسال..
اني رجمت..
بخاطري..
فاالقلب..
مستانس..
من انسه...
من يرى..
يحترق..
ولايلبي..
عين دعته..
فااين الساعي..
انا رحمته..
وياريته..
يعلم..
بمعاناتي...
لاشقاء...
سااكون..
قريب..
لمضاربكم..
في كتبان الرمال...
اعلمي..
عزيزتي..
اني اوحبكي..
كثير..
رغم انشغالاتك..
وتدمير خلاياء..
الحب الااني اعشقك..
واخاف عليك...
من سراب..
الانظار..
لازلتي..
لاتدركين..
من عينك شئ..
ولاتدركي..
مدى خوفي عليك...
كل شئ..
ينتهي..
ولايطوله الانسان..
ماردت بي..
الايام..
ولم تسالي عني..
انا ليس..
رخيص عندكي..
ياسيدتي..
ولم انالا..
البيعة..
من مكانتي..
سااظل..
رفيق العمر..
للعشق تاريخ..
اورخه في قلبي...
غدا ياتي الفجر...
ويلاح الصباح..
وينفرج ضباب..
الكاتم نفسي..
لكني سااضل..
خلف كواليس..
ابحث عن ذاتي..
في قلبك...
افتش عن..
ذاتي ان كنت...
ملائم لشهامتك..
لاياظلام...
لاترمي كثب السحبي...
بالرمال..
وعيني اليمة..
من جريان دمعتها..
اروت جمال الحي..
غرسوا سيوفهم..
ولم اهابو...
ولم تهابني...
الانون عينيكي....
احمدعمر اللحوري.
المكلا حضرموت.
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